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Pooran Jot Pragte Ghat Antri, Tab Khalsa Nikhalis Kahave...SGGS
Means a disciple can never attain/claim perfection in meditation
(Bhakti) unless he realise this Jyoti between eye center              
                     with the extreme mercy of his Satguru
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    NBT  BLOGGER


            Mimiyane ko mazboor  "Mannu Bhai"

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे और काले धन के खिलाफ बाबा रामदेव के आंदोलनों से निपटने के तौर-तरीकों को लेकर पार्टी के अंदर सरकार की जो फजीहत की गई उससे आहत होकर अज्ञातवास में जाने को मजबूर नॉमिनेटिड पीएम मनमोहन सिंह कुछ चुनींदा अखबारों के वरिष्ठ संपादकों से बातचीत के बहाने अवतरित हुए। उनकी सीमित एवं संक्षिप्त प्रेस 'वार्ता' से जो कुछ निकला वह न तो आश्चर्यचकित करने वाला था और न ही आश्वस्त।

फरवरी में मिस्टर मजबूर ने न्यूज चैनलों के संपादकों के सामने गठबंधन की मजबूरी का जो रोना रोया था, उसी की विलंबित ध्वनि आज के आलाप में एक बार फिर सुनाई पड़ी। लोकपाल के मुद्दे पर उन्होंने जो कूटनीतिक भाषा इस्तेमाल की उसका निहितार्थ बहुत गूढ़ नहीं है। उन्होंने कहा कि मैं तो लोकपाल के दायरे में आने को तैयार हूं, लेकिन मंत्रिमंडल के सहयोगी इसका विरोध कर रहे हैं। पंजाब के स्थानीय लोक मुहावरे में इसे कुछ इस तरह कहा जाता है कि 'रंडी तां रंडापा कट्टन नू तैयार वे मगर मश्टंडे नहीं कट्टन देंदे।'

सवाल यह है कि मजबूत लोकपाल के मामले में आपकी पार्टी और सरकार के लोग गला फाड़- फाड़कर जिस संविधान की दुहाई देकर सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि अन्ना हजारे की टोली के लोगों की औकात पूछते फिर रहे हैं, क्या उसी संविधान में वर्णित प्रधानमंत्री के अधिकारों और शक्तियों का आपको कोई ज्ञान नहीं है? यदि है और आप अपनी गैंग के बेईमान मंत्रियों के खिलाफ अपनी शक्तियों का उपयोग नहीं करते तो आपको सिर्फ मजबूर ही माना जाएगा। यदि नहीं है तो यह देश की जनता का दुर्भाग्य है कि वह एक नादान, मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री के रूप में आपको झेलने पर मजबूर है। कोई शरीफ और ईमानदार आदमी अगर प्रधानमंत्री के रूप में खुलेआम अपनी मजबूरी का रोना रोये तो उसके कारणों का विश्लेषण अनिवार्य हो जाता है। काफी माथापच्ची के बाद इस अल्पज्ञ ब्लॉगर के मन-मस्तिष्क में उसकी मजबूरियों के जो बिम्ब उभरते हैं वे काफी निराशाजनक हैं। पहली नजर में मजबूरी का पहला और सबसे बड़ा कारण यह उभरता है कि न तो आप राजनीतिज्ञ हैं और न ही आपकी कोई राजनीतिक ताकत है। आप दुनिया के जाने माने अर्थशास्त्री हैं और आपकी उदारीकरण की नीति की दुनिया कायल है। यह बात दीगर है कि देश का आम आदमी उससे रोजाना घायल होता आ रहा है। आप संविधान में वर्णित उस तकनीकी व्यवस्था के आधार पर अपने पद पर शोभायमान हैं जिसके तहत संसद के किसी भी सदन का व्यक्ति प्रधानमंत्री हो सकता है। आप अपने राजनीतिक जनाधार (जो है ही नहीं) के बल पर जनता द्वारा न तो स्वयं चुने गए हैं और न ही अपनी ईमानदारी और विद्वता के बूते लोकसभा में कामचलाऊ बहुमत के लायक संख्या में सांसद जुटा पाने में सक्षम हैं इसलिए आपकी केबिनेट के ज्यादातर मंत्री जो लोकसभा से हैं, आपकी बात नहीं सुनते। यह एक अप्रिय सत्य है।

अपनी मजबूरियों को गिनाने के क्रम में आपने चार जून की रात में रामलीला मैदान में निहत्थे अनशनकारियों पर हुई बर्बर पुलिस कार्रवाई को दुखद बताया इसके लिए आप करुणा के पात्र हैं। लेकिन माई बाप! अगर उस मजबूरी के कारणों का दशांश भी खुलासा कर देते तो इस देश की अनपढ़, जाहिल और गंवार जनता आपका बड़ा अहसान मानती। बेचारी यही सोच कर संतोष कर लेती कि मगरमच्छी ही सही, कोई तो है जो उसकी पीड़ा पर आंसू बहाने को 'तैयार' दिखाई पड़ता है।

इक्कीसवीं सदी के भारत की राजनीति में जिस राजमाता और युवराज व्यवस्था का श्रीगणेश आपकी पार्टी ने नए सिरे से किया है वह भी आपकी मजबूरी का एकमात्र नहीं तो प्रमुख कारण अवश्य है। आपको तकनीकी तौर पर प्रधानमंत्री के रूप में दूसरे कार्यकाल के लिए उनकी 'कृपा' की आवश्यकता थी जिसके बिना आपका राज्यसभा में पहुंच पाना संभव नहीं था। गठबंधन की जिस मजबूरी का रोना आपने एक बार फिर रोया है, उसका अनुभव आपको अपने पहले कार्यकाल में बड़ी अच्छी तरह हो चुका था। कहने का मतलब यह कि जब रजिया के रूप में एक बार आप सत्ता की सड़ांध से रूबरू हो चुके थे तो उस बेचारी को गुंडों के बीच में दुबारा झोंक देने की क्या मजबूरी थी?

आप एक स्वतंत्र देश के सम्मानित नागरिक हैं और प्रथम सेवक के रूप में अपनी दुर्दशा देख चुके हैं। इस आधार पर भी आप राजमाता से करबद्ध प्रार्थना कर सकते थे कि 'देवि! आपका यह सेवक सिंह अब बूढ़ा हो चुका है। इन मक्कार सियासी भेडि़यों को परास्त करने की शक्ति इसमें शेष नहीं रही है अत: आप इसे क्षमा करें और अपने राजनीतिक जंगल का राज किसी युवा एवं ऊर्जावान शेर को सौंप दें। वैसे भी आए दिन दस नंबरी दरबारी किसी ऐसे आदमी के सत्ता संभाल लेने की संभावनाओं की ओर संकेत करते ही रहते हैं।

आपकी दयनीय दशा को देखकर द्रवित होना स्वाभाविक है। आप अगर मजबूर या कमजोर नहीं हैं तो क्यों नहीं अपनी संवैधानिक शक्तियों का उपयोग आम आदमी और उसके माध्यम से देश की भलाई के लिए करते? अगर आपको लगता है कि आपके इर्द-गिर्द दलालों, माफियाओं, घूसखोरों और अवसरवादियों का जमघट है तो क्यों नहीं इन जालिमों के खिलाफ तलवार उठाते। गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज ने कहा था:

चूं कार अज हमां हीलते दरगुजश्त।

हलालस्त बुर्दन ब शमशीर दस्त।।

अर्थात जब अन्य सभी उपाय निरर्थक सिद्ध हो जाएं तो अन्याय के विरुद्ध तलवार उठा लेना उचित है। निर्णय आपके हाथ में है। आप राजनीतिक राक्षसों से मजबूरन घिरे रहना चाहते हैं या देश की जनता को इनसे त्राण दिलाने के लिए गुरु की नसीहत पर अमल करना चाहते हैं। फिलहाल जिस स्थिति में आप हैं उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि मन्नू! गुंडे तुझे डटने नहीं देंगे और दस नंबरी तुझे हटने नहीं देंगे।'


                                A              N               D


                      LOKPAL  KO PARLOK BHEJNE KI TYAARI


जन सेवा की गर्ज से जनता के सामने हाथ फैलाने वाले नेताओं ने मतदाता का अपर्याप्त समर्थन पाने के बावजूद स्वयं को जनार्दन समझना शुरू कर दिया। अंग्रेजी ढांचे के तथाकथित भारतीय संविधान की आड़ में देश की रग-रग में भ्रष्टाचार की दीमक लगाने वाले कपटी, कुचाली जीव एक बार फिर सिर से लेकर पांव तक नंगे हो गए। लोकतंत्र के नाम पर लूट को संस्थागत रूप प्रदान करने वालों के काले चेहरे लोकपाल बिल पर पॉलिटिकल फेयर ऐंड लवली के इस्तेमाल के बाद भी काले के काले ही रहे।

भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए सिविल सोसायटी के सदस्यों को मजबूरी में संयुक्त प्रारूप समिति में शामिल करने और रस्म अदायगी के नाम पर होने वाली आखिरी बैठक के खत्म होने के बाद सरकारी सदस्यों की ओर से पेश किए गए प्रस्तावों के सामने आने के बाद तो कम से कम यही साबित होता है। इसे इस रूप में भी देखा, महसूस किया जा सकता है कि कांग्रेसी सिविल सोसायटी के सदस्यों पर अपनी विजय के बाद कहकहे लगाते फिर रहे हैं। कुल मिलाकर कहीं खुशी, कहीं गम का माहौल है।

आजादी के बाद से देश की सत्ता पर ज्यादातर समय तक काबिज रहने वाली पार्टी के गुर्गे आपादमस्तक नग्न हो जाने के बावजूद स्वयं को भारत का असली कर्णधार बताने की कवायद में तल्लीन हैं। स्वाधीनता संग्राम में अपनी भूमिका का मनमाना दोहन कर लेने के बाद भी इन पिशाचों की पाखंडपूर्ण राजनीतिक नौटंकी अभी समाप्त नहीं हुई है। लगता है कि अपनी छल-प्रपंच से परिपूर्ण राजनीतिक संस्कृति के परिणामस्वरूप देश के आधे से ज्यादा हिस्से में अपनी राजनीतिक जमीन गंवा चुकी यह जीर्ण-शीर्ण पार्टी अब भी अपनी दुरवस्था पर आत्ममंथन करने को तैयार नहीं है। गांधी के नाम पर शासन करने वाली गांधियों की जमात में चाटुकारों का बोलबाला है। परायी शक्तियों की पतवार के सहारे स्वाधीनता की लोकतांत्रिक नाव को पार लगाने का सपना देखने वाले लोग इसे कब फिर से उन्हीं के हाथों में सौंप कर देश से पलायन कर परदेसी अभयारण्य मे बस जाएं यह संभावना इनकी करतूतों से दिन ब दिन बलवती होती जा रही है। भ्रष्टाचार और उसकी टकसाल से ढलने वाले काले सिक्कों को विदेशी बैंकों में जमा कर भारत में राजनीतिक रोटियां और वोट खरीदने वाले सबसे पुराने और बड़े राजनीतिक दल के लोगों को भला उस पर अंकुश लगाने की बात कैसे हजम हो सकती है। अन्ना हजारे ऐंड कम्पनी जिस सिविल सोसायटी का तथाकथित प्रतिनिधित्व और देश की गरीब जनता की पीड़ा का जो पुराण पढ़ रही है उसका एक श्लोक भी इन सरकारी सांड़ों को नहीं सुहाता। इन्हें अपनी सींगों से बेईमानी के खेत को खुरच-खरच कर उसमें घूस की खाद से सियासी खेती लहलहाने का हुनर हासिल करने का 50 साला तजुर्बा है। इन्हें मालूम है कि जनता हाथ जोड़ने या सेवा करने से वोट नहीं देती बल्कि शोषण और उत्पीड़न के परिणामस्वरूप अपनी तात्कालिक दारुण दशा को भुलाने के लिए दारू पाने के बाद संतुष्ट होती है। दारू के लिए पैसा चाहिए। पैसा कमाने का इन्होंने कोई कारखाना नहीं खोल रखा है। 

   पैसा पाने के लिए ये जनहित के नाम पर विदेशों से कभी तोप के, कभी हवाई के, कभी पनडुब्बी के और कभी फसल के मौसम में गेहूं के आयात के सौदे करते हैं, जिसमें जनता के गाढ़े पसीने की कमाई खर्च होती है। बदले में इन्हें निर्यात करने वाली फर्मों से कमिशन और अन्य अनेक उपहार प्राप्त होता है, जिसे ये चुनाव के मेले में तरक्की की रंगबिरंगी तस्वीर पेश करने के लिए खर्च करते हैं यानी जनता के सिर पर जनता का जूता मार कर उसे अपने पक्ष में चल पड़ने के लिए विवश करने की कला ही इनकी सबसे बड़ी पूंजी है।

घपले, घोटाले के घटाटोप में ये अपनी मनमोहनी सूरत से जनता को आकर्षित करते हैं। कोई सूटकेस में समा जाता है, तो कोई पशुओं के भोजन को अपना आहार बना लेता है। कोई सत्ता के दलालों को कोसता-कोसता खुद चौकड़ी के दलदल में धंस जाता है, तो कोई काले धन का बिस्तर बनाकर सुख की नींद लेता है। कोई तांत्रिकों के आगे शीश झुकाता है, तो कोई शेयर घोटाले को अंजाम देकर हर्षाया फिरता है। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि हे जनता के जनहितकारी कागजी तूती-अन्ना हजारे जी महाराज, माउंटबैटन की औलादों के नक्कारखाने में आपकी आवाज कोई नहीं सुनने वाला। जिस तरह से इन्होंने गांधी बाबा को उनके तमाम वसूलों के साथ राजघाट के चबूतरे में हे राम! लिख कर दफन कर दिया है, उसी तरह एक दिन आपको भी उनके आसपास किसी पत्थर के नीचे दबा दिया जाएगा और प्रचार किया जाएगा कि बेचारा! कितना भला आदमी था, ठीक बापू की तरह। गरीबों की भलाई की बात करता था और गरीबनवाजों से लड़ने की हिमाकत करता रहता था। इसका यही हश्र होना था इसलिए सरकार ने पूरी श्रद्धा के साथ इसे एक कोने में अहिल्या बना कर छोड़ दिया। शोषित, पीड़ित जनता की प्रतीक बन चुकी इस शिला का कष्ट दूर करने के लिए अब युग बदलने और फिर किसी राम के चरणस्पर्श के परिणामस्वरूप अपनी मुक्ति की प्रतीक्षा ही इसकी नियति और इसका भविष्य है।

धरती से लेकर अंबर तक
नेताओं ने डाका डाला।
छू रहा बुलंदी आये दिन
राजाओं का करतब काला।
जब कानी मोई ले रिश्वत
तब जारी हो मोबाइल खत
लाखों करोड़ का भारत में
होता है 2जी घोटाला।